Photosynthesis Equation

Photosynthesis Equation – प्रकाश संश्लेषण वह प्रक्रिया है , जिसमें हरे पौधे सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल की उपस्थिति में CO₂ व जल से भोजन बनाते हैं तथा O₂ छोड़ते हैं |

6CO₂ + 12H2O + प्रकाश + क्लोरोफिल→ C6H12O6 + 6O2 + 6H2O + क्लोरोफिल

प्रकाश-संश्लेषण कहाँ सम्पन्न होता है ?

पौधों में प्रकाश-संश्लेषण अर्थात् प्रकाशीय ऊर्जा (light energy) को रासायनिक ऊर्जा (chemical energy) में परिवर्तित करने की क्रिया हरितलवकों (chloroplasts) में सम्पन्न होती है | उच्च श्रेणी के पौधों में पत्ती का पर्णमध्योतक (mesophyll tissue) सर्वाधिक सक्रिय प्रकाश संश्लेषी ऊतक है | इस ऊतक की कोशिकाओं में अनेक हरितलवक (chloroplasts) पाए जाते हैं, जो दो झिल्लियों से घिरे रहते हैं | इन दोनों झिल्लियों के बीच के स्थान को पेरीप्लास्टीडियल स्पेस (periplastidial space) कहते हैं | इस प्रकार , प्रत्येक हरितलवक (chloroplast) में तीन झिल्लियों , बाह्य झिल्ली (outer membrane), आन्तरिक झिल्ली (inner membrane) तथा थायलेकॉयड झिल्ली (thylakoid membrane) तथा तीन गुहाएँ (lumen or space) , पेरीप्लास्टीडियल स्पेस (periplastidial space), स्ट्रोमा (stroma) तथा थायलैकॉयड गुहा (thylakoid lumen) होती हैं |

प्रकाश संश्लेषण की प्रारम्भिक क्रिया (primary events of photosynthesis) थायलैकॉयड की झिल्लियों (thylakoid membranes) में प्रारम्भ होती है | ये सामान्यतया लेन्स की आकृति के (lens shaped) होते हैं | इनकी लम्बाई 5-10 μm तथा चौड़ाई 2-4 µm होती है | एक कोशिका में इनकी संख्या लगभग 20-40 तक होती है | इनकी गुहा में स्ट्रोमा (stroma) नामक प्रोटीनयुक्त तरल पदार्थ भरा होता है जिसमें अनेक प्रकार के लवण , ऑस्मियोफिलिक बूँदें (osmiophilic droplets) तथा 70S प्रकार के राइबोसोम्स व कुछ मात्रा में डीएनए आदि होते हैं | हरितलवक में पृथक् झिल्लियों से घिरी चपटी थैली जैसी रचनाएँ थायलैकॉयड्‌स (thylakoids) होती हैं | कुछ स्थानों पर अनेक थायलैकॉयड्स इस प्रकार स्थित होते हैं , जैसे अनेक सिक्के एक-दूसरे के ऊपर रखे गए हों | ऐसे प्रत्येक समूह को ग्रेनम (granum, plugrana) कहते हैं | विभिन्न ग्राना एक-दूसरे के साथ आपस में नालवत् रचनाओं द्वारा जुड़े रहते हैं | इन नालवत् रचनाओं को स्ट्रोमा लेमिली या फ्रेट्स (stroma lamellae or frets) कहते हैं |

प्रकाश की प्रकृति (Nature of Light)

सूर्य का प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है जिसे सौर ऊर्जा (solar energy) या विद्युत् चुम्बकीय ऊर्जा (electromagnetic energy) कहते हैं | यह ऊर्जा तरंगों के रूप में गति करती है। दो समीपवर्ती तरंगों के शिखर (crest) के बीच की दूरी को तरंगदैर्ध्य (wavelength Å) कहते हैं | तरंगदैर्ध्य जितनी छोटी होती है, उतनी ही ऊर्जा अधिक होती है | सूर्य के प्रकाश में विभिन्न तरंगदैर्ध्य की तरंगें होती हैं (तरंगदैर्ध्य को नैनोमीटर, nm में नापा जाता है) | प्रकाश स्पेक्ट्रम का छोटा भाग ही दृश्य प्रकाश (visible light) बनाता है | दृश्य प्रकाश के प्रत्येक रंग के लिए विशेष तरंगदैर्ध्य होती है, जैसे – बैंगनी (violet) 390-430 nm, नीला (indigo) 430-470 nm, आसमानी (blue) 470-500 nm, हरा (green) 500-580 nm, पीला (yellow) 580-600 nm, नारंगी (orange) 600-650 nm, लाल (red) 647nm या 650-760 nm | जब सूर्य का प्रकाश एक काँच के प्रिज्म से होकर निकलता है तो यह विभिन्न रंगों में बँट जाता है | रंगों के इस पुंज को ही दृश्य स्पेक्ट्रम (visible spectrum) कहते हैं | पूर्ण दृश्य स्पेक्ट्रम सात रंगों का बना होता है जो क्रमशः बैंगनी (violet), नीला (indigo). आसमानी (blue), हरा (green), पीला (yellow), नारंगी (orange) तथा लाल (red) हैं | लाल (red) रंग के बाद भी अधिक लम्बी किरणें होती हैं जो अदृश्य होती हैं, जैसे- अवरक्त किरणें (infrared rays) | इसी प्रकार से बैंगनी (violet) रंग में भी छोटी तरंगदैर्ध्य वाली किरणें होती हैं | ये भी अदृश्य होती हैं, जैसे पराबैंगनी किरणें (ultraviolet rays) | इस प्रकार सौर ऊर्जा का वह भाग जो सूर्य से पृथ्वी पर आता है, दृश्य स्पेक्ट्रम कहलाता है और इसका कुछ भाग ही प्रकाश-संश्लेषण (photosynthesis) में प्रभावी है |

प्रकाश में तरंग (wave) तथा कण (particle) दोनों के गुण होते हैं | प्रकाश केवल तरंग के रूप में ही गति (travel) नहीं करता, बल्कि कणों के रूप में भी गति (travel) करता है | प्रकाश ऊर्जा के कणों या समूहों (packets) को फोटोन (photons) कहते हैं | फोटोन, वास्तव में प्रकाश ऊर्जा की निश्चित मात्रा है जिसे क्वाण्टम (quantum) कहते हैं | प्रकाश की ऊर्जा की मात्रा निरन्तर (continuously) नहीं आती, बल्कि पृथक् समूहों, क्वाण्टा के रूप में आती है | इस प्रकार सूर्य का प्रकाश विभिन्न आवृत्ति के फोटोन की भांति होता है | फोटोन की ऊर्जा ही प्रकाश के रंग का निर्धारण करती है |

प्रकाश-कर्म II (Photo-act II Photosystem II)

प्रकाश-कर्म ।। की मुख्य विशेषता जल का प्रकाश-अपघटन (photolysis of water) है जिसमें ऑक्सीजन निष्कासित होती है |

इस कर्म के वर्णकों में जब विशेष तरंगदैर्ध्य वाली किरणों का अवशोषण होता है तो वर्णक तन्त्र II (P – 680) से उत्तेजित इलेक्ट्रॉन्स निष्कासित होते हैं जिससे पर्णहरिम स्वयं ऑक्सीकृत रूप (oxidised state) में आ जाते हैं | ऑक्सीकृत वर्णक (P – 680) OH आयन से इलेक्ट्रॉन्स लेकर फिर अपचयित (reduced) हो जाता है और OH– (हाइड्रॉक्सिल मूलक) से “[OH]” शेष रह जाता है | 4[OH] मूलक से जल के दो अणुओं और ऑक्सीजन के एक अणु का निर्माण होता है | इस क्रिया में मुक्त हाइड्रोजन परमाणु (H+) NADP के अपचयन (reduction) में काम आते हैं |

4OH → 2H2O + 02

इस कार्य में मैंगनीज (manganese) की विशेष भूमिका रहती है, परन्तु क्लोरीन (chlorine) एवं बाइकार्बोनेट (bicarbonate) भी इस कार्य में सहायता करते हैं | इस प्रकार एक ऑक्सीजन का अणु एवं चार इलेक्ट्रॉन्स बनने में प्रकाश के कम से कम आठ क्वाण्टा (8 quanta) की आवश्यकता होती है |

4H2O → 4H+ + 4OH–

4OH– → 4OH + 4e–

4(OH) → 2H2O + O2

वर्णक तन्त्र ।। में P680 से निष्कासित इलेक्ट्रॉन्स एक पदार्थ फियोफाइटिन (pheaophytin) द्वारा ग्रहण किए जाते है , जहाँ से ये इलेक्ट्रॉन्स क्रमशः दो प्लास्टोक्यूनोन (Plasto-Quinone = PQA व PQB ) द्वारा ग्रहण किए जाते हैं | अपचवित प्लास्टोक्यूनोन (plastoquinone अर्थात् प्लास्टोहाइड्रोक्यूनोन plastohydroquinone) से साइटोक्रोम – b6-f यौगिक (cytochrome – b6-f complex) इलेक्ट्रॉन्स ग्रहण करके अपचयित हो जाता है | इस परिवर्तन में ऊर्जा मुक्त होती है जो ATP के रूप संचित हो जाती है | अपचयित साइटोक्रोम-b6-f यौगिक से इलेक्ट्रॉन्स प्लास्टोसायनिन (Plasto-Cyanin = PC) द्वारा ग्रहण किए जाते हैं जो इस क्रिया में अपचयित हो जाता है | अपचयित प्लास्टोसायनिन से इलेक्ट्रॉन्स प्रकाश-कर्म I के “P700” के अणुओं द्वारा ग्रहण किए जाते हैं जो ऑक्सीकृत अवस्था से अब अपचयित अवस्था में आ जाता है | “P700”, इलेक्ट्रॉन्स को केवल उसी समय ग्रहण करता है जिस समय इसमें से अपने इलेक्ट्रॉन्स सूर्य की ऊर्जा लेकर पहले ही निष्कासित हो चुके हों | इस प्रकार प्लास्टोसायनिन एक प्लग (plug) के रूप में कार्य करके प्रकाश-कर्म II को प्रकाश-कर्म I से जोड़ता है | इस प्रकार दो प्रकाश-कर्मों के बहुत से इलेक्ट्रॉन वाहकों (electron carriers) के श्रृंखला में जुड़ने से जल के वियोजन से उत्पन्न इलेक्ट्रॉन्स NADP. H⁺ तक पहुँच जाते हैं |

प्रकाश-कर्म । की कार्य-विधि (Operation of Photosystem I)

इस प्रक्रिया में सूर्य के प्रकाश के फोटोन (photon) पर्णहरिम-a (“Pigment-700)” से टकराते हैं | फोटोन की क्वाण्टम (quantum) ऊर्जा को अवशोषित करके पर्णहरिम के चार इलेक्ट्रॉन्स उत्तेजित अवस्था (excited state) में आ जाते हैं , अर्थात् इन इलेक्ट्रॉन्स में ऊर्जा की मात्रा अधिक हो जाती है | इन इलेक्ट्रॉन्स में अधिक ऊर्जा होने के कारण पर्णहरिम से इनका उत्सर्जन हो जाता है और पर्णहरिम का अणु ऑक्सीकृत (oxidised) अवस्था में आ जाता है |

वर्णक तन्त्र I द्वारा निष्कासित उत्तेजित इलेक्ट्रॉन्स एक पदार्थ आयरन-सल्फर प्रोटीन-ग्राही A(FeS) द्वारा ग्रहण कर लिये जाते हैं जिससे A(FeS) अपचयित (reduced) अवस्था में आ जाता है | अपचयित A(FeS) से ये इलेक्ट्रॉन्स फेरीडॉक्सिन (ferredoxin-Fd) द्वारा ग्रहण कर लिये जाते हैं जो अब अपचयित अवस्था में आ जाता है | फेरीडॉक्सिन से इलेक्ट्रॉन्स FAD द्वारा ग्रहण किये जाते हैं जो अब जल के वियोजन से प्राप्त हाइड्रोजन द्वारा अपचयित होकर FADH2 बनाता है | अपचयित (FAD) से हाइड्रोजन परमाणु NADP+ द्वारा ग्रहण किये जाते हैं जो अपचयित होकर NADP.H + H+ (=NADPH2) अवस्था में आ जाता है |

इस प्रकार “P700” के उत्तेजित (excited) अणुओं से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन्स तथा जल के वियोजन से प्राप्त हाइड्रोजन (2H+) द्वारा NADP से NADP.H+H+ निर्माण करके प्रथम प्रकाश-कर्म समाप्त हो जाता है | NADP के साथ जुड़ी हाइड्रोजन , प्रकाशहीन अभिक्रिया (dark reaction) में कार्बन डाइऑक्साइड के अपचयन के काम आती है | NADP.H +H+ को कोशिका की अपचयन शक्ति (reducing power) कहा जाता है |

प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (Photo-Phosphorylation)

प्रकाश की उपस्थिति में अकार्बनिक फॉस्फेट (iP) तथा ADP के द्वारा उच्च ऊर्जा युक्त अणु ATP के निर्माण को प्रकाण फॉस्फोरिलीकरण (photophosphorylation) कहते हैं | ऑर्नन एवं उसके सहयोगियों ने सन् 1954 में प्रकाश की ऊर्जा के रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तन के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण खोज की | उनके अनुसार यह दो प्रकार से होता है –

1 – चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (Cyclic Photo-Phosphorylation)

2 – अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (Non-Cyclic Photo-Phosphorylation)

1 – चक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (Cyclic Photo-Phosphorylation) – प्रकाश-कर्म । में P700 से निष्कासित अधिक ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन्स (e–) एक पथ के द्वारा तो FeS complex से होते हुए NADP में चले जाते हैं तथा एक-दूसरे चक्रीय (cyclic) पथ द्वारा FeS से इलेक्ट्रॉन्स क्रमशः फेरीडॉक्सिन (Ferredoxin , Cyt-b-f यौगिक तथा प्लास्टोसायनिन Plasto-Cyanin = PC) से होते हुए पुनः P700 में वापस लौटते हैं | इलेक्ट्रॉन्स की इस वापसी के समय फेरीडॉक्सिन व Cyt-b6-f यौगिक के बीच ऊर्जा ADP और iP (inorganic Phosphate) से ATP के अणुओं के निर्माण में काम आती है |

ADP+ inorganic Phosphate (iP) + E → ATP + H₂O

क्योंकि इस क्रिया में इलेक्ट्रॉन्स P700 से उत्सर्जित होकर पुनः P700 में एक चक्रीय क्रिया द्वारा ATP का संश्लेपण करते हुए वापस लौट आते हैं , इसलिए इस क्रिया को चक्रीय प्रकाश फॉस्फोरिलीकरण (cyclic photo-phosphorylation) कहते हैं |

2 – अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (Non-cyclic Photo-Phosphorylation) – एक दूसरी इलेक्ट्रॉन्स स्थानान्तरण श्रृंखला प्रकाश तन्त्र II (Photosystem II) से उत्सर्जित इलेक्ट्रॉन्स से चलती है | इस स्थानान्तरण श्रृंखला में पर्णहरिम 680 से उत्सर्जित उच्च ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन्स (e–) ऑक्सीकृत पर्णहरिम (P680) के अणुओं में वापस नहीं लौटते , बल्कि ये पदार्थ फियोफाइटिन (phaeophytin) , प्लास्टोक्यूनोन (plastoquinone) , साइटोक्रोम-b 6-f (cytochrome-b 6-f) और प्लास्टोसायनिन (plastocyanin) से होकर वर्णक तन्त्र P700 में चले जाते हैं और ऐसा समझा जाता है कि प्लास्टोक्यूनोन (plastoquinone) और साइटोक्रोम-b 6-f (cytochrome-b 6-f) के बीच ATP अणुओं का निर्माण होता है , क्योंकि इस चक्र में वर्णक तन्त्र II से निकले इलेक्ट्रॉन्स (e) वर्णक तन्त्र (P680) में वापिस नहीं लौटते इसलिए इस क्रिया को अचक्रीय प्रकाश-फॉस्फोरिलीकरण (non-cyclic photo-phosphorylation) कहते हैं |

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