Chordata Characteristics

Chordata characteristics – द्विपावर्षीय एवं ड्यूटरोस्टोमी यूसीलोमैट यूमेटाजोआ जिनमें जीवनभर या भ्रूण में, शरीर को सहारा देने हेतु, एक लम्बी, लचीली व दृढ़ अन्तःकंकालीय (endoskeletal) छड़-पृष्ठरज्जु या मेरुदण्ड या नोटोकॉर्ड (notochord) की उपस्थिति एक मूल लक्षण होता है।

कॉर्डेटा (Chordata) शब्द की उत्पत्ति ग्रीक (Greek) भाषा के दो शब्दों से हुई है (Gr. chord = string or cord, ata = bearing = धारक) जिसका अर्थ है नोटोकॉर्ड (notochord) रखने वाले जन्तु। कॉर्डेटा शब्द 1880 में बाल्फॉर (Balfour) ने दिया था। कॉर्डेटा संघ के जन्तुओं में जीवन भर या जीवन की किसी अवस्था में शरीर को सहारा देने हेतु पृष्ठ सतह पर एक लम्बी, लचीली व दृढ़ छड़ पायी जाती है, जिसे मेरुदंड या मोटोकॉर्ड (notochord) कहते हैं। इसकी उपस्थिति के कारण इस संघ के जन्तुओं को पृष्ठवंशी या कॉडेंट्स (chordates) कहते हैं।

जन्तु जगत् (Kingdom Animalia) के वे प्राणी जिनमें जीवन की किसी अवस्था में भी नोटोकॉर्ड (notochord) नहीं पायी जाती है, उन्हें नॉनकॉर्डेटा (nonchordata) समूह में रखते हैं तथा उन जन्तुओं को अपृष्ठवंशी या नॉनकॉर्डेट्स (nonchordates) कहते हैं। संघ कॉर्डेटा में लगभग 55,000 जीवित जातियां (living species) हैं। कॉडेटा का सबसे बड़ा समूह पिसीज (pisces) है | इसकी लगभग 33,000 जातियां ज्ञात हैं। कॉर्डेटा का सबसे छोटा समूह रेप्टीलिया (Reptilia) है।

कॉर्डेटा के तीन मूल लक्षण ( Three Fundamental Chordate Characters

1 – मेरुदण्ड अर्थात् नोटोकॉर्ड (Notochord) – यह भ्रूण की मीसेन्डोडर्म से बनी और मेरुरज्जु एवं आहारनाल के बीच, शरीर की मध्यपृष्ठ रेखा में फैली एक ठोस, अक्षीय (axial) अन्तःकंकाल छड़ होती है। यह बड़ी-बड़ी कोशिकाओं की बनी तथा संयोजी ऊतक के आवरण से ढ़की होती है। कुछ में यह आजीवन, परन्तु अधिकांश में केवल भ्रूणीय प्रावस्था में होती है-वयस्क में, इसके स्थान पर, मेरुरज्जु के चारों ओर, मीसोडर्मी कशेरुकदण्ड (vertebral column) बन जाती है।

2 – पृष्ठ नालवत् केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (Dorsal Tubular Central Nervous System) – उच्च श्रेणी के नॉनकॉर्डेट जन्तुओं (ऐनेलिडा, आर्थो-पोडा, आदि) में तन्त्रिका रज्जु (nerve cord) होती है, परन्तु यह ठोस, प्रायः दोहरी तथा मध्यअधर रेखा में स्थित होती है । कॉर्डेटा में तन्त्रिका रज्जु इकहरी, खोखली (नालवत्) तथा शरीर की मध्यपृष्ठ रेखा में होती है। यह भ्रूण की एक्टोडर्म से बनती है। इसकी गुहा को तन्त्रिका गुहा अर्थात् न्यूरोसील (neurocoel) कहते हैं। अधिकांश कॉडेंट्स में यह सिर में मस्तिष्क (brain) बनाती है। शेष भाग रीढ़रज्जु, मेरुरज्जु या सुषुम्ना (spinal cord) होती है। दोनों मिलकर केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र (central nervous system) बनाते हैं।

3 – ग्रसनीय क्लोम दरारें (Pharyngeal Gill Clefts) – प्रत्येक कॉडेंट के भ्रूण में, ग्रसनी (pharynx) की दीवार में, मूलतः श्वसन के लिए, जोड़ीदार पार्श्व क्लोम दरारें बनती हैं। इनके बनने की विधि विचित्र होती है- ग्रसनी की दीवार से बाहर की ओर तथा देहभित्ति से भीतर की ओर अँगुलीसदृश प्रवर्ध निकलकर परस्पर जुड़ जाते हैं और इनके बीच की भित्तियाँ समाप्त हो जाती हैं। अतः इन दरारों से ग्रसनी की गुहा बाहर खुल जाती है। जलीय कॉडेंट्स में दरारें प्रायः आजीवन रहतीं और श्वसन में भाग लेती हैं, परन्तु स्थलीय कॉडेंट्स में ये वयस्क अवस्था तक बन्द हो जाती हैं।

उपरोक्त तीन मूल लक्षणों के अतिरिक्त कॉर्डेटा के अन्य विशिष्ट लक्षण निम्नवत हैं-

4 – अधर हृदय (Ventral Heart) – नॉनकॉर्डेटा के विपरीत, कॉर्डेटा में, देहगुहा के अधरभाग में स्पष्ट, पेशीयुक्त हृदय होता है। यह एक थैलीनुमा हृदयावरण (pericardium) द्वारा घिरा होता है। हृदयावरणी गुहा (pericardial cavity) देहगुहा (coelom) का भाग होती है।

5 – रुधिर परिसंचरण तन्त्र (Blood Vascular System) – कॉर्डेटा तथा कुछ उच्च नॉनकॉर्डेटा में रुधिर स्पष्ट रुधिरवाहिनियों एवं केशिकाओं (capillaries) में, एक निश्चित दिशा में, बहता है। ऐसे परिसंचरण तन्त्र को बन्द रुधिर परिसंचरण तन्त्र (closed blood vascular system) कहते हैं। कॉर्डेटा में यह अधिक विकसित होता है। नॉनकॉर्डेटा के विपरीत, कॉर्डेटा में, पृष्ठ रुधिरवाहिनी (dorsal blood vessel) में रुधिर आगे से पीछे की ओर तथा प्रमुख अधर रुधिरवाहिनी (ventral blood vessel) में पीछे से आगे की ओर बहता है। इसके अतिरिक्त, कॉर्डेटा में आहारनाल से रुधिर लाने वाली शिरा, हृदय में न जाकर, यकृत में जाती है और इस प्रकार एक यकृती निर्वाहिका तन्त्र (hepatic portal system) बनाती है।

6 – लाल रुधिराणु (Red Blood Corpuscles) – कॉर्डेटा के रुधिर में लाल श्वसन रंगा, हीमोग्लोबिन (haemoglobin) होती है। यह एक विशेष प्रकार की कोशिकाओं-लाल रुधिराणुओं में होती है। स्तनियों के अतिरिक्त, अन्य कोंडेंटा में, रुधिराणु केन्द्रकमय होते हैं। नॉनकॉर्डेटा में भी कुछ में हीमोग्लोबिन होता है , परन्तु यह प्लाज्मा (plasma) में घुला होता है।

7 – पश्च-गुद पुच्छ (Postanal Tail) – नॉनकॉर्डेटा में शरीर का पिछला, पूँछ जैसा भाग प्रमुख खोखले शरीर का ही भाग होता है और गुदा इसके छोर पर होती है। कॉर्डेटा में पूँछ शरीर का गुदा से पीछे का ठोस, पेशीयुक्त, कंकालयुक्त एवं मूलतः खण्डयुक्त (segmented) भाग होती है। यह मुख्यतः गमन में सहायता करती है।

कॉर्डेटा (Chordata) तथा नॉनकॉर्डटा (Nonchordata)में प्रमुख अंतर –

कॉर्डेटा (Chordata)नॉनकॉर्डटा (Nonchordata)
जीवन की किसी-न-किसी प्रावस्था में पृष्ठरज्जु ।पृष्ठरज्जु का पूर्ण अभाव।
केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र मध्यपृष्ठ एवं नालवत्।मध्यअधर एवं ठोस।
जीवन की किसी-न-किसी अवस्था में ग्रसनीय क्लोम दरारें।इनका पूर्ण अभाव।
ठोस व पेशीय पश्च-गुद पुच्छ वयस्क में या केवल भ्रूण में उपस्थित ।पश्च-गुद पुच्छ अनुपस्थित।
हृदय अधरतल की ओर।हृदय पृष्ठतल की ओर।
पृष्ठ रुधिरवाहिनी में रुधिर का बहाव आगे से पीछे की ओर।पृष्ठ रुधिरवाहिनी में रुधिर का बहाव पीछे से आगे की ओर।
यकृती निर्वाहिका तन्त्र (hepatic portal system) उपस्थित ।इस तन्त्र का अभाव।
हीमोग्लोबिन लाल रुधिराणुओं में।हीमोग्लोबिन या अन्य श्वसन रंगा पदार्थ रुधिर के प्लाज्मा में घुला।

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