Structure Of Mitochondria

Structure Of Mitochondria – (Gr. Mito = धागा, Chondrion = कण) माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria) यूकैरियोटिक कोशिकाओं का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कोशिकांग है , जिसे कोशिका का शक्ति गृह (Power house of the Cell) कहा जाता है | इसका प्रमुख कार्य कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration) के माध्यम से भोजन में संचित रासायनिक ऊर्जा को ATP के रूप में परिवर्तित करना है, जो कोशिका की सभी जैविक क्रियाओं के लिए आवश्यक ऊर्जा प्रदान करता है |

माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) कोशिका के भीतर ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख केंद्र होता है, इसलिए इसे “कोशिका का ऊर्जा गृह (Powerhouse of the Cell)” कहा जाता है | कोशिका में होने वाली लगभग सभी जैव-रासायनिक क्रियाओं, जैसे वृद्धि , विभाजन , प्रोटीन संश्लेषण , सक्रिय परिवहन तथा मांसपेशियों के संकुचन के लिए ऊर्जा की आवश्यकता होती है | यह ऊर्जा ATP (Adenosine Triphosphate) के रूप में उपलब्ध कराई जाती है , जिसका निर्माण मुख्य रूप से माइटोकॉण्ड्रिया में होता है |

यह केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं है , बल्कि यह कोशिकीय श्वसन , उपापचय (Metabolism) , कैल्शियम आयनों के संतुलन , कोशिका संकेतों (Cell Signaling) तथा नियोजित कोशिका मृत्यु (Apoptosis) जैसी अनेक महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भी भाग लेता है | यही कारण है कि इसे कोशिका का सबसे सक्रिय एवं आवश्यक कोशिकांग माना जाता है |

माइटोकॉण्ड्रिया की खोज (Discovery of Mitochondria)

सन् 1880 में जर्मन वैज्ञानिक कोलिकर (Kölliker) ने कीटों की रेखित मांसपेशियों (Striated Muscles) में पहली बार इन सूक्ष्म संरचनाओं का अवलोकन किया | सन् 1890 में अल्टमान (Altmann) ने इनका विस्तृत अध्ययन किया और इन्हें बायोप्लास्ट (Bioplast) नाम दिया | उनका मानना था कि ये कोशिका के जीवित एवं सक्रिय कण हैं | सन् 1897 में सी. बेन्डा (C. Benda) ने इनका नाम माइटोकॉण्ड्रिया (Mitochondria) रखा। यही नाम आज विश्वभर में स्वीकार किया जाता है |

इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी के विकास के साथ वैज्ञानिकों ने पाया कि माइटोकॉण्ड्रिया केवल संरचनात्मक कोशिकांग नहीं है , बल्कि कोशिका के ऊर्जा उत्पादन का मुख्य केंद्र भी है |

कोशिका में वितरण (Distribution of Mitochondria) माइटोकॉण्ड्रिया लगभग सभी यूकैरियोटिक (Eukaryotic) पादप एवं जन्तु कोशिकाओं में पाया जाता है | हालांकि इसकी संख्या प्रत्येक कोशिका में समान नहीं होती | जिन कोशिकाओं को अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है , उनमें माइटोकॉण्ड्रिया की संख्या भी अधिक होती है |

उदाहरण के लिए –

शुक्राणु (Sperm) की मध्य भाग की कोशिकाएँ ,वृक्क (Kidney) की कोशिकाएँ , यकृत (Liver) की कोशिकाएँ , कंकालीय (Skeletal) मांसपेशियाँ , हृदय की मांसपेशी कोशिकाएँ आदि |

इन सभी में ऊर्जा की आवश्यकता अधिक होने के कारण माइटोकॉण्ड्रिया प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

इसके विपरीत , जीवाणु (Bacteria) तथा सायनोबैक्टीरिया (Cyanobacteria) जैसे प्रोकैरियोटिक जीवों में माइटोकॉण्ड्रिया अनुपस्थित होता है , क्योंकि उनमें कोशिकीय श्वसन की क्रियाएँ कोशिका झिल्ली पर सम्पन्न होती हैं |

आकार एवं आकृति (Size and Shape)

माइटोकॉण्ड्रिया का आकार एवं आकृति स्थिर नहीं होती। यह आवश्यकता के अनुसार आपस में जुड़ (Fusion) या अलग (Fission) होकर अपनी संख्या एवं आकार में परिवर्तन कर सकता है |यह कोशिका के प्रकार, आयु तथा कार्य के अनुसार बदल सकती है | यही विशेषता इसे अन्य अनेक कोशिकांगों से अलग बनाती है | सामान्यतः इसकी आकृति निम्न प्रकार की हो सकती है –

छड़ीनुमा (Rod-shaped) , धागेनुमा (Thread-like) , तंतु के आकार के (Filamentous) , अंडाकार (Oval) , गोलाकार (Spherical) आदि |

सामान्यतः इसकी लंबाई 3–5 माइक्रोमीटर (µm) तथा व्यास 0.5–1.0 माइक्रोमीटर (µm) होता है | कुछ कोशिकाओं में तंतु के आकार के (Filamentous) माइटोकॉण्ड्रिया 40 माइक्रोमीटर तक लंबे हो सकते हैं |

माइटोकॉन्ड्रिया की आंतरिक संरचना (Internal Structure of Mitochondria)

माइटोकॉन्ड्रिया को इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से देखने पर यह दोहरी परत (Double Layer) वाली एक कैप्सूल जैसी संरचना दिखाई देती है ,इसके मुख्य भाग निम्नलिखित हैं –

1 – वाह्य झिल्ली (Outer Membrane) – ​यह माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी बाउंड्री दीवार है | यह बिल्कुल चिकनी होती है और इसमें पोरिन (Porins) नाम के छोटे-छोटे गेट (छिद्र) होते हैं, जिनसे पोषक तत्व आसानी से अंदर-बाहर आ-जा सकते हैं |

पोरिन वास्तव में विशेष प्रोटीन होते हैं जो बाहरी झिल्ली में छोटे-छोटे सुरंग या छिद्र (Pores) बनाते हैं | इन छिद्रों के जरिए कोशिका द्रव्य (Cytoplasm) से पोषक तत्व , आयन , एटीपी (ATP) और छोटे अणु बिना किसी रुकावट के आसानी से अंदर-बाहर आ-जा सकते हैं | इन माइटोकॉन्ड्रियल पोरिन को VDAC (Voltage-Dependent Anion Channel) भी कहा जाता है |

2 – आंतरिक झिल्ली (Inner Membrane) – यह अंदर की सुरक्षा दीवार है, जो बहुत ही सख्त होती है | यह केवल चुनिंदा चीज़ों को ही अंदर आने देती है | इसी झिल्ली पर इलेक्ट्रॉन ट्रांसपोर्ट चेन (ETC) और ऊर्जा बनाने वाले खास एंजाइम तैनात रहते हैं |

3 – क्रिस्टी (Cristae) – ​यह माइटोकॉन्ड्रिया का सबसे अनोखा हिस्सा है , अंदर की झिल्ली सीधे रहने के बजाय अंदर की तरफ अँगुली जैसी मुड़ी हुई लहरें बनाती है , जिन्हें क्रिस्टी कहते हैं | यह झिल्ली मुड़कर सरफेस एरिया (क्षेत्रफल) को कई गुना बढ़ा देती है , ताकि कम जगह में ज़्यादा से ज़्यादा ऊर्जा बन सके |

4 – ऑक्सीसोम/F-1 कण (Oxisomes/F-1 particles) – क्रिस्टी की सतह पर टेनिस के रैकेट जैसे छोटे-छोटे कण चिपके दिखाई देंगे | इन्हें ऑक्सीसोम कहते हैं | इनके ऊपर लगा ATP Synthase एंजाइम ही असली “एनर्जी मैन्युफैक्चरिंग मशीन” है जो ATP बनाती है |

5 – अंतर-झिल्ली अवकाश (Intermembrane Space) – बाहरी और अंदरूनी झिल्ली के बीच में थोड़ा खाली स्थान होता है , जिसे अंतर्झिल्ली अवकाश (Intermembrane Space) कहते हैं | ऊर्जा निर्माण की प्रक्रिया के दौरान प्रोटॉन्स ( H⁺ ions) यहीं पर इकट्ठा होते हैं |

6 – मैट्रिक्स (Matrix) – माइटोकॉन्ड्रिया के बिल्कुल बीच में एक गाढ़ा जेली जैसा द्रव भरा होता है , जिसे मैट्रिक्स कहते हैं | इसमें क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) चलाने वाले एंजाइम होते हैं |​ सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इसके पास स्वयं का DNA (Mitochondrial DNA – mtDNA) और 70S राइबोसोम RNA तथा प्रोटीन संश्लेषण के लिए आवश्यक कुछ एंजाइम भी होते हैं , इसी कारण माइटोकॉण्ड्रिया कुछ प्रोटीनों का निर्माण स्वयं कर सकता है तथा द्विखंडन (Binary Fission) द्वारा यह अपने जैसे नए माइटोकॉन्ड्रिया खुद बना सकता है | इसीलिए इसे ” अर्ध-स्वायत्त कोशिकांग ” (Semi-autonomous Cell Organelle) भी कहते हैं |

Mitochondrial DNA – mtDNA एक छोटा गोलाकार आनुवंशिक पदार्थ है जो यूकेरियोटिक कोशिकाओं के ऊर्जा-उत्पादक अंगों (माइटोकॉन्ड्रिया) के अंदर पाया जाता है | मनुष्यों में , इसमें 37 जीन होते हैं विभिन्न जीवों में इनकी संख्या भिन्न हो सकती है , जो कोशिकीय ऊर्जा रूपांतरण में शामिल आवश्यक प्रोटीन और आरएनए के लिए कोड करते हैं | नाभिकीय डीएनए के विपरीत , Mitochondrial DNA केवल माता से ही प्राप्त होता है |

माइटोकॉण्ड्रिया के कार्य (Functions of Mitochondria)

माइटोकॉण्ड्रिया केवल कोशिका का ऊर्जा केंद्र ही नहीं है , बल्कि यह अनेक महत्वपूर्ण जैविक प्रक्रियाओं का भी नियंत्रण करता है | कोशिका की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूरा करने से लेकर कोशिका की वृद्धि , उपापचय तथा नियोजित कोशिका मृत्यु (Apoptosis) तक इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है |

माइटोकॉण्ड्रिया के प्रमुख कार्य (Functions of Mitochondria) निम्नलिखित हैं –

1 – ATP का निर्माण – माइटोकॉण्ड्रिया का सबसे महत्वपूर्ण कार्य ATP (Adenosine Triphosphate) का निर्माण करना है | ATP को कोशिका की ऊर्जा मुद्रा (Energy Currency) कहा जाता है | भोजन से प्राप्त ग्लूकोज , वसा तथा अन्य पोषक पदार्थों का ऑक्सीकरण करके माइटोकॉण्ड्रिया ऊर्जा उत्पन्न करता है और उसे ATP के रूप में संग्रहित करता है |

2 – कोशिकीय श्वसन (Cellular Respiration) – माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकीय श्वसन का मुख्य केंद्र है | इस प्रक्रिया में भोजन के अणुओं का क्रमिक ऑक्सीकरण होता है और ऊर्जा मुक्त होती है |

कोशिकीय श्वसन के तीन प्रमुख चरण हैं –

– क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle) – माइटोकॉण्ड्रिया के मैट्रिक्स में होता है |

– ग्लाइकोलाइसिस (Glycolysis) – कोशिकाद्रव्य में होता है |

– इलेक्ट्रॉन परिवहन तंत्र (Electron Transport Chain) – यह अंतः झिल्ली की क्रिस्टी पर सम्पन्न होता है |इसके अंत में ATP Synthase एंजाइम की सहायता से बड़ी मात्रा में ATP का निर्माण होता है।

3 – जैविक अणुओं का उपापचय (Metabolism of biomolecules) – माइटोकॉण्ड्रिया कार्बोहाइड्रेट , वसा तथा कुछ अमीनो अम्लों के उपापचय में भाग लेता है | विशेष रूप से वसीय अम्लों (Fatty Acids) का ऑक्सीकरण माइटोकॉण्ड्रिया में होता है , जिससे अतिरिक्त ऊर्जा प्राप्त होती है |

4 – नियोजित कोशिका मृत्यु (Apoptosis) – जब कोई कोशिका क्षतिग्रस्त या अनुपयोगी हो जाती है , तब माइटोकॉण्ड्रिया विशेष प्रोटीनों को मुक्त करके Apoptosis की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है | इससे क्षतिग्रस्त कोशिकाएँ नष्ट हो जाती हैं और शरीर स्वस्थ बना रहता है |

निष्कर्ष (Conclusion) –

माइटोकॉण्ड्रिया कोशिका का अत्यंत महत्वपूर्ण कोशिकांग है , जो ऊर्जा उत्पादन का प्रमुख केंद्र होने के कारण “कोशिका का ऊर्जा गृह (Powerhouse of the Cell)” कहलाता है | यह ATP का निर्माण करके कोशिका की सभी आवश्यक जैविक एवं उपापचयी क्रियाओं के लिए ऊर्जा उपलब्ध कराता है | इसके अतिरिक्त , यह कोशिकीय श्वसन , कैल्शियम आयनों के संतुलन , ऊष्मा उत्पादन तथा नियोजित कोशिका मृत्यु (Apoptosis) जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | अपने स्वयं के DNA और राइबोसोम की उपस्थिति के कारण माइटोकॉण्ड्रिया अन्य कोशिकांगों से अलग और विशिष्ट माना जाता है |
आशा है कि इस लेख के माध्यम से आपको माइटोकॉण्ड्रिया की संरचना , कार्य , विशेषताएँ और महत्व को सरल एवं वैज्ञानिक ढंग से समझने में सहायता मिली होगी | यदि यह जानकारी उपयोगी लगी हो , तो इसे अपने मित्रों के साथ साझा करें और जीवविज्ञान से जुड़े ऐसे ही ज्ञानवर्धक लेखों के लिए Biologylecturs.com पर नियमित रूप से विज़िट करते रहें |

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