Phylum Chordata Classification

Phylum Chordata Classification – फाइलम कॉर्डेटा (Phylum Chordata) का वर्गीकरण जीव विज्ञान (Biology) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय है , जो विद्यालयी शिक्षा , तथा विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से विशेष महत्त्व रखता है | इस लेख में कॉर्डेटा संघ की प्रमुख विशेषताओं , उसके उपसंघों (Subphyla) तथा विभिन्न वर्गों (Classes) का सरल , क्रमबद्ध और विस्तृत वर्णन किया गया है। इस लेख में यूरोकॉर्डेटा (Urochordata) , सेफालोकॉर्डेटा (Cephalochordata) तथा वर्टिब्रेटा (Vertebrata) का वर्गीकरण विस्तार से समझाया गया है | साथ ही, वर्टिब्रेटा के प्रमुख वर्ग— मत्स्य (Pisces) , उभयचर (Amphibia) , सरीसृप (Reptilia) , पक्षी (Aves) तथा स्तनधारी (Mammalia) की विशिष्ट विशेषताओं , प्रमुख उदाहरणों और उनके विकासीय (Evolutionary) संबंधों का भी सरल एवं स्पष्ट भाषा में वर्णन किया गया है | यदि आप फाइलम कॉर्डेटा का वर्गीकरण, उसकी मुख्य विशेषताएँ, उपसंघ, विभिन्न वर्गों की पहचान, तथा विकासीय संबंधों को एक ही स्थान पर संपूर्ण , व्यवस्थित और विश्वसनीय रूप में समझना चाहते हैं , तो यह लेख आपके लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा |

कॉर्डेटा संघ को करोटि (cranium), कशेरुक दंड (vertebral column) तथा युग्मित उपांगों (paired appendages) के आधार पर दो समूहों में बांटा गया है – एक्रेनिया तथा क्रेनिएटा |

समूह 1 – एक्रेनिया (Acrania) –

लक्षण – 1 – इनमें खोपड़ी (cranium) का अभाव होता है |

2 – इनमें वास्तविक जबड़े नहीं होते हैं |

3 – इनमें नोटोकॉर्ड (notochord) जीवन-पर्यन्त पायी जाती है तथा कशेरुक दंड नहीं बनता है |

4 – युग्मित उपांग (pair appendages) अनुपस्थित होते हैं |

उपसंघ ।- हेमीकॉर्डेटा (Subphylum I- Hemichordata)

1 – शरीर कृमिरूपी (worm-like), भंगुर (fragile) तथा कोमल होता है | यह तीन भागों में विभेदित होता है – शुंड (proboscis), कॉलर (collar) एवं धड़ (trunk) |

2 – इन जन्तुओं में पाये जाने वाले buccal diverticulum को नोटोकॉर्ड नहीं माना जाता है |

3 – इनमें कंकाल ऊतक (skeletal tissue) अनुपस्थित होता है |

4 – देहभित्ति (body wall) एक स्तरीय एपिधीलियम से बनी होती है तथा डर्मिस (dermis) अनुपस्थित होती है |

5 – आहार नाल “U” के आकार की होती है |

6 – परिसंचरण तंत्र (circulatory system) खुले प्रकार (open type) का होता है |

7 – देहगुहा ऐन्टेरोसील(enterocoel) प्रकार की होती है. जो protocoel, mesocoel तथा metacoel में विभेदित होती है |

8 – उत्सर्जन प्रोबोसिस (proboscis) में स्थित single glomerulus द्वारा होता है |

9 – ये एकलिंगी (unisexual) होते हैं , प्रजनन लैंगिक (sexual) प्रकार का होता है तथा निषेचन बाह्य होता है | जीवन चक्र में टॉरनेरिया (Tornaria) लारवा पाया जाता है |

उदाहरण – बैलेनोग्लॉसस (Balanoglossus) , प्रोटोग्लॉ (Protoglossus) , सैकोग्लॉस (Saccoglossus)

उपसंघ ॥ – यूरोकॉर्डेटा (Subphylum II- Urochordata)

1 – समुद्री जल में मिलने वाले एकल (single) या निवही (colony) जो च‌ट्टानों से चिपके हुए पाये जाते हैं |

2 – ग्रसनी क्लोम दरारें, नालाकार पृष्ठ तंत्रिका नाल तथा नोटोकॉर्ड जैसे कॉर्डेटा लक्षण केवल लारवा अवस्था में पाये जाते हैं | नोटोकॉर्ड केवल पूंछ में ही होती है |

3 – शरीर के चारों ओर ट्यूनिसिन (tunicin) का चोल पाया जाता है |

4 – आहार नाल “U” के आकार की होती है |

5 – जन्तु उभयलिंगी अर्थात नर एवं मादा जननांग एक ही जन्तु में होते हैं | निषेचन बाहर जल में होता है |

6 – इनमें प्रतिगामी कायान्तरण (retrogressive metamorphosis) पाया जाता है जिसके फलस्वरूप पूर्ण विकसित लारवा कम विकसित व्यस्क में परिवर्तित हो जाता है |

चोल या टेस्ट की रचना, मुख को स्थिति, एट्रियल गुहा, क्लोम छिद्रों एवं जीवन चक्र की दशाओं के आधार पर उपसंघ यूरोकॉर्डेटा को तीन वर्गों में बांटा गया है –

वर्ग 1 – लार्वेसिया (Larvacea)

1 – ये स्वतन्त्र जीवी पेलेजिक (pelagic) तथा एकल (solitary) होते हैं |

2 – वाह्य आवरण टेस्ट (test) अस्थाई होता है. जिसे समय-समय पर उतार दिया जाता है |

3 – स्थाई पूँछ (tail) पायी जाती है जिसमें नोटोकॉर्ड व नर्वकॉर्ड उपस्थित होती हैं |

4 – एट्रीयल गुहा छोटी या अनुपस्थित होती है |

5 – एक जोड़ी क्लोम दरारें पायी जाती हैं |

6 – शारीरिक संगठन लारवा स्तर का होता है| लारवा अवस्था में ही जनन होने लगता है अर्थात ये नियोटेनिक (neotinic) होते हैं |

उदाहरण – 1 – ऑइकोप्लूरा (Oikopleura) 2 – ऐपेन्डीकुलेरिया (Appendicularia)

वर्ग 2 – एसीडिएसिया (Asscidiacea)

1 – ये समुद्री एकल या निवहीं जन्तु हैं जो समुद्री तल या चट्टानों पर चिपके रहते हैं |

2 – वयस्क जन्तु में पूंछ (tail) अनुपस्थित होती है |

3 – टेस्ट (test) ट्यूनिसिन की बनी स्थायी रचना है। टेस्ट में पेशीय बेन्ड (muscle bands) अनुपस्थित होते हैं |

4 – वयस्क जन्तु में अनेक क्लोम दरारें (gill clefts) तथा गैंग्लिओन (ganglion) पाया जाता है |

5 – उत्सर्जन अंग के लिए सबन्यूरल ग्रंथियां (subneural glands) पायी जाती हैं |

सबन्यूरल ग्रंथियां (subneural glands) – समुद्री जीव (ट्यूनिकेट्स/एसिडियन्स) सिओना जैसे ट्यूनिकेट्स में, मस्तिष्क के सामने एक ग्रंथि पायी जाती है , जिसे सबन्यूरल ग्रंथि कहा जाता है | यह ग्रंथि तंत्रिका तंत्र के न्यूरोएंडोक्राइन (neuroendocrine) से संबंधित है तथा उत्सर्जन का कार्य भी करती है |

6 – ये द्विलिंगी होते हैं तथा लारवा अवस्था स्वतन्त्र तथा पूर्ण विकसित होती है |

7 – लारवा में नोटोकॉर्ड , तंत्रिका रन्जु तथा पुच्छ पायी जाती है | ये अंग प्रतिगामी कायान्तरण (retrogressive metamorphiosis) के समय विलुप्त हो जाते हैं तथा एक स्थानबद्ध (sessile) वयस्क बन जाता है |

उदाहरण – 1 – सायोना (Ciona), 2 – हर्डमानिया (Herdmania = sea squirt), 3 – बोट्रीलस (Botryllus) 4 – क्लेवलाइना (Clavelina)

वर्ग 3 – थैलिएसिया (Thaliacea)

1 – इस वर्ग के जन्तु एकल (solitary) या निवही (colonial) होते हैं |

2 – ये स्वतन्त्र जीवी या पेलेजिक (pelagic) जन्तु हैं |

पेलेजिक (pelagic) – इसका तात्पर्य खुले सागर या महासागर के उस विशाल क्षेत्र से है जो तट के समीप नहीं होता और न ही समुद्र की तली (seafloor) से जुड़ा होता है |

3 – खोल (test) पारदर्शी (transparent) तथा स्थायी होता है |

4 – कवच में वर्तुल पेशी पट्ट (circular muscle bands) पाये जाते हैं |

5 – ग्रसनी में दो बड़े या छोटे क्लोम छिद्र पाये जाते हैं |

6 – क्लोम छिद्र एट्रियल गुहा में खुलते हैं |

एट्रियल गुहा (Atrial cavity or Atrium) यूरोकॉर्डेटा (Urochordata) तथा सेफैलोकॉर्डेटा (Cephalochordata) के प्राणियों में पाई जाने वाली एक जल से भरी गुहा है , जो ग्रसनी (pharynx) को चारों ओर से घेरे रहती है , इसका मुख्य कार्य श्वसन और भोजन छानने (filter feeding) में सहायता करना है |

7 – ये द्विरूपी (dimorphic) जन्तु हैं जिनमें अलैंगिक एवं लैंगिक सदस्यों में पीढ़ी एकान्तरण (alternation of generation) पाया जाता है |

उदाहरण – 1 – पाइरोसोमा (Pyrosoma) , 2 – डोलियोलम (Doliolum) , 3 – साल्पा (Salpa) |

उपसंघ III – सेफैलोकॉर्डेटा (Subphylum III -Cephalochordata)

( Gr., Kephale = head ; chorde = cord)

1 – ये एक ही स्थान पर रहने वाले अचल जन्तु हैं किन्तु तैर भी सकते हैं | अधिकतर इनका शरीर कीचड़ में धंसा रहता है , सिर्फ अगला भाग बाहर निकला रहता है |

2 –शरीर मछली के समान तथा छोटा होता है | जल में तैरने के लिये पखने (fins) होते हैं |

3 – मूल कॉडेंट लक्षण जीवन पर्यन्त पाये जाते हैं |

4 – नोटोकॉर्ड तथा तंत्रिका रज्जु (notochord and nerve cord) शरीर में एक सिरे से दूसरे सिरे तक फैले रहते हैं |

5 – उत्सर्जन उत्सर्जन उत्सर्जन सोलिनोसाइट्स (solenocytes) सहित प्रोटोनेफ्रीडिया (protonephridia) के द्वारा होता है |

6 – परिवहन तंत्र पूर्ण विकसित (well developed) तथा बन्द प्रकार (closed type) का होता है |

7 –जन्तु एकलिंगी (unisexual) होते हैं। जनन ग्रंथियां अनेक तथा निषेचन समुद्री जल में होता है

8 – परिवर्धन अप्रत्यक्ष (indirect) तथा जीवन चक्र (life cycle) में स्वतन्त्र लार्वा अवस्था पायी जाती है |

उदाहरण – 1 – बैलेनोग्लॉसस (Balanoglossus) , 2 –हर्डमानिया (Herdmania) , 3 – एम्फिऑक्सस (Amphioxus)

समूह 2 – क्रेनियेटा (GROUP 2 – CRANIATA)

1 – मस्तिष्क, अस्थियों व उपास्थियों के बने बक्से में सुरक्षित रहता है | इस बक्से को क्रेनियम (cranium) कहते हैं |

2 – सिर स्पष्ट एवं मस्तिष्क सुविकसित होता हैं |

3 – ग्रसनी क्लोम दरारें केवल भ्रूण अवस्था में पायी जाती हैं |

4 – क्रेनियेटा के अन्तर्गत केवल एक उपसंघ वर्टिब्रेटा रखा गया है |

उपसंघ ।- वर्टिबेटा (Subphylum ।- Vertebrata)

1 – नोटोकॉर्ड केवल भ्रूण अवस्था में पाय जाता है |

2 – वयस्क अवस्था में नोटोकॉर्ड , कशेरुक दंड (vertebral column) में रूपान्तरित हो जाता है |

3 – शरीर चार भागों सिर , ग्रीवा , धड़ व पूंछ में विभाजित होता है |

जबड़े की उपस्थिति एवं अनुपस्थिति के आधार पर इस उपसंघ को दो प्रभागों में बांटा गया है –

प्रभाग 1 – एग्नैथा (DIVISION 1 – AGNATHA)

(Gr – A = absent ; gnathos = jaws)

1 – मुख में वास्तविक जबड़ों का अभाव होता हैं , केवल कूट जबडे (false jaws) उपस्थित होते हैं |

2 – जोड़ीदार उपांग (paired limbs) नहीं होते हैं |

3 – कशेरुक दंड अविकसित होता है |

प्रभाग एग्नैथा को दो वर्गों में वर्गीकृत किया गया है :

वर्ग 1 – ओस्ट्रेकोडर्मी (Class 1 – Ostracodermi)

इस वर्ग के सभी जन्तु विलुप्त (extinct) हो चुके हैं |

वर्ग 2 – साइक्लोस्टोमैटा (Class 2 – Cyclostomata)

(Gr. Cyklos = circular , stoma = mouth)

1 – जबड़ों के न होने से मुख गोल होता है | एक मध्य नासा छिद्र (median nostril) भी उपस्थित होता है |

2 – शरीर पर शल्कों , जोड़ीदार पखनों (fins) एवं जबड़ों (bony jaws) का अभाव होता है |

3 – वयस्क में नोटोकॉर्ड तथा आंतरिक कर्ण में केवल दो अर्थवृत्ताकार नलिकायें पायी जाती हैं |

4 – एकलिंगी होते हैं तथा जनद एक (single gonad) ही होते हैं , निषेचन बाह्य होता है एवं परिवर्धन अप्रत्यक्ष प्रकार का होता है | इनके लारवा को एमोसीट (ammocoete) कहते हैं |

उदाहरण – 1 – पैट्रोमाइजॉन (Petromyzon) : लैम्प्रे , 2 – मिक्सीन (Myxine) : हैग फिश

प्रभाग 2 – नैथोस्टोमैटा (DIVISION 2 – GNATHOSTOMATA)

(Gr., Gnathos jaws; stomak mouth)

1 – मुख वास्तविक जबड़ों (true jaws) से घिरा रहता है |

2 – चलन जोड़ीदार पखनों (fins) या पादों (limbs) के द्वारा होता है |

3 – कशेरुक दंड (vertebral column) पूर्ण विकसित होता है |

4 – अन्तःकर्ण में 3 अर्धवृत्ताकार नलिकायें (semicircular canals) होती हैं |

5 – जन्तु एकलिंगी तथा जनद युग्मित (gonads paired) होते हैं |

नैथोस्टोमैटा (gnathostomata) को चलन अंगों (locomotory organs), श्वसनांगों (respiratory organs), हृदय (heart) आदि के आधार पर दो अधिवर्गों (superclasses) में बांटा गया है –

1 – पिसीज (Pisces) 2 – टेट्रापोडा (Tetrapoda)

अधिवर्ग-1 (Super Classes-1) – पिसीज (Pisces)

(L. Piscis = fish)

1 – सभी जन्तु जलीय होते हैं | ये अलवणीय (freshwater) तथा समुद्री (marine) दोनों प्रकार के जल में पाये जाते हैं |

2 – शरीर सिर (head) , घड़ (trunk) तथा पुच्छ (tail) में विभेदित होता है |

3 – तैरने के अनुरूप शरीर धारा-रेखित (stream-lined) होता है |

4 – इनका शरीर शल्कों (scales) से ढका रहता है |

5 – तैरने के लिए जोडीदार अंस (pectoral) तथा श्रोणि पखने (pelvic fins) पाये जाते हैं | इनके अलावा मध्य पृष्ठीय (median dorsal) तथा पुच्छीय पखने (caudal fins) भी होते हैं |

6 – अन्तःकंकाल उपास्थि (cartilage) या अस्थि (bone) का बना होता है |

7 – श्वसन (respiration) क्लोमों (gills) द्वारा होता है | क्लोम 5 से 7 जोड़ी होते है जो खुले रहते हैं या ऑपरकुलम (operculum) से ढके रहते हैं |

8 – हृदय द्विकक्षीय होता है | इसे “वीनस हृदय” (venous heart) कहते हैं क्योंकि इसमें सिर्फ अशुद्ध रुधिर (impure blood) आता है , जो शुद्धिकरण हेतु हृदय से क्लोमों में जाता है , तथा वहां से शुद्ध रुधिर (pure blood) हृदय में वापस नहीं आता अपितु सीधा शरीर के विभिन्न अंगों में चला जाता है , अर्थात रुधिर का परिसंचरण एकपथीय (unicircuit) होता है |

9 – ये अनियततापी (poikilothermal) होते हैं |

10 – क्रेनियल तंत्रिकाएं (cranial nerves) 10 जोड़ी होती हैं |

11 – बाह्य व मध्य कर्ण अनुपस्थित होते हैं, सिर्फ अन्तःकर्ण (internal ears) पाये जाते हैं |

12 – वृक्क (kidney) मीसोनेफ्रोस (mesonephros) प्रकार के होते हैं |

मीसोनेफ्रोस (Mesonephros) कशेरुकी (vertebrate) जीवों में भ्रूणावस्था के दौरान विकसित होने वाला दूसरा प्रमुख उत्सर्जन अंग (kidney) है , इसे ” मध्य गुर्दा ” भी कहा जाता है, जो जलीय कशेरुकी जीवों में मुख्य उत्सर्जी अंग होता है , लेकिन स्तनधारियों (जैसे मनुष्य) में यह भ्रूण के विकास के शुरुआती हफ्तों में ही काम करता है | भ्रूण के विकास के बाद के चरणों में, जब स्थायी और परिपक्व गुर्दा (मेटानेफ्रोस) विकसित होता है, तब मीसोनेफ्रोस धीरे-धीरे विलुप्त (degenerates) हो जाता है |

13 – निषेचन (fertilisation) आन्तरिक (internal) या बाह्य (external) प्रकार का होता है

14 – इनकी शिशु अवस्था को fry कहते हैं |

मछलियों को – कंकाल (Skeleton) की प्रकृति ( उपास्थियुक्त या अस्थियुक्त } , मुख (Mouth) की स्थिति और संरचना तथा पंख (Fins) और शल्क (Scales) की संरचना आदि तीन मुख्य आधारों तीन वर्गों में बाँटा गया है –

वर्ग 1 – प्लैकोडर्मी (Class-1 Placodermi)

1 – इस वर्ग में डेवोनियन से परमियन (Devonian to Permian) युग तक पायी जाने वाली विलुप्त (extinct) मछलियां आती हैं | ये अलवणीय जल की प्रथम मछलियां थीं |

2 – इनके शरीर पर अस्थिल प्लेटों (bony plates) का आवरण पाया जाता था , इसीलिए इन्हें कवचित मछलियां (armoured fishes) कहते हैं |

उदाहरण – 1 – डाइनिक्थीज (Dinichthyes) , 2 – क्लाइमेटियस (Climatius)

वर्ग 2 – कॉन्ड्रिक्थीज (Class 2 – Chondrichthyes) (Gr. – Chondros = cartilage ; ichthys = fish)

1 – बाह्यकंकाल , प्लेकॉयड शल्कों (placoid scales) का बना होता है | इनका पुच्छीय पखना (caudal fin) असममित प्रकार का होता है |

2 – पूंछ हेटेरोसर्कल (heterocercal) प्रकार की होती है |

3 – अंत: कंकाल उपास्थि (cartilage) का बना होता है |

4 – क्लोम दरारें (gill slits) 5-7 जोड़ी होती हैं तथा क्लोम दरारों के ऊपर ऑपरकुलम (operculum) अनुपस्थित होता है |

5 – जबड़े तथा दांत उपस्थित होते हैं | जबड़ों का सस्पेन्सोरियम हायोस्टाइलिक (hyostylic) प्रकार का होता है

हायोस्टाइलिक (Hyostylic jaw) सस्पेंशन कशेरुकी जीवों में जबड़े के निलंबन का एक प्रकार है। इसमें ऊपरी जबड़ा सीधे मस्तिष्क बॉक्स (कपाल) से जुड़ा नहीं होता है , बल्कि यह हायोमैन्डिबुलर (hyomandibular) हड्डी या उपास्थि द्वारा कपाल से जुड़ा रहता है , यह निलंबन अधिकांश आधुनिक मछलियों (जैसे- शार्क और बोनी फिश) में पाया जाता है |

6 – वायु आशय (airbladder) तथा फेफड़े (lungs) नहीं होते हैं। यकृत दो पिंडकीय (bilobed) होता है |

7 – आंत्र में एक सर्पिल कपाट (spiral valve) होता है | अवस्कर द्वार (cloaca) पाया जाता है |

8 – हृदय (heart) में दो वेश्म , एक अलिन्द (auricle) तथा एक निलय (ventricle) पाये जाते हैं। इनके अलावा शिरा कोटर (sinus venosus) तथा कोनस आर्टीरिओसस (conus arteriosus) भी होते हैं।

कोनस आर्टीरिओसस (conus arteriosus) निलय (Ventricle) के आधार से जुड़ा हुआ एक शंक्वाकार (cone -shaped) या नली के आकार का पेशीय कक्ष होता हैयह हृदय से बाहर निकलने वाले रक्त के मार्ग को नियंत्रित करता है और शुद्ध या मिश्रित रक्त को शरीर के विभिन्न भागों में धकेलता है | इसमें एक वाल्व होता है जो रक्त को वापस लौटने से रोकता है |

9 -एम्पुलाऑफ लोरेंजिनी (ampulla of Lorenzini) इन मछलियों के सिर के पृष्ठ सतह पर स्थित होते हैं। ये ताप ग्राही (thermoreceptor) होते हैं |

लोरेंजिनी के एम्पुला (Ampulla of Lorenzini) मुख्य रूप से शार्क , रे और काइमेरा जैसी उपास्थि वाली मछलियों की त्वचा में पाए जाने वाले विशेष संवेदी अंग (इलेक्ट्रोरेसेप्टर्स) हैं। ये मछलियों को उनके आस-पास के पानी में शिकार द्वारा उत्पन्न कमज़ोर विद्युत क्षेत्रों, तापमान परिवर्तनों और लवणता का पता लगाने में मदद करते हैं |

10 – जनन वाहिनियां (gonoducts) अवस्कर (cloaca) में खुलती हैं |

11 – नर में मैथुन अंग (copulatory organs) अर्थात् क्लास्पर (claspers) पाये जाते हैं |

12 – ये अंडयुज (oviparous) या अंडजरायुज (ovoviviparous) होते है |

उदाहरण – 1 – स्कॉलियोडोन (Scoliodon) – कुत्ता मछली (Dog fish) , 2 – स्फिरना (Sphyrna) – हथौड़ा शीर्ष शार्क ( Hammer-headed shark)

वर्ग 3 – ऑस्टिक्थीज या टीलिओस्टोमाई (Class 3 – Osteichthyes or Teleostomi)

1 – इस वर्ग की मछलियां अलवणीय (fresh-water) तथा समुद्री जल (marine water) में पायी जाती हैं |

2 – बाह्यकंकाल (exoskeleton) गैनॉयड (ganoid) , टीनॉयड (ctenoid) या चक्राभ (cycloid) प्रकार के शल्कों का बना होता है |

3 – इनका पुच्छीय पखना (caudal fin) होमोसर्कल (homocercal) या डाइफिसर्कल (diphycercal) प्रकार का होती है |

4 – अन्तः कंकाल (endoskeleton) अस्थियों (bones) का बना होता है |

5 – क्लोम दरारें (gill slits) 4 जोड़ी होती हैं, जो ऑपरकुलम (operculum) से ढकी रहती हैं |

6 – सहायक श्वसन अंग (accessory respiratory organs) या वायु आशय (air bladder) प्रायः उपस्थित होते हैं, जो जल स्थैतिक (hydrostatic) सन्तुलन बनाये रखने में सहायक होते हैं |

7 – आंत में सर्पिल कपाट (spiral valve) नहीं होता , यकृत में सामान्यतया तीन पिंड (three lobes) पाये जाते हैं |

8 – जनन वाहिनियां अलग-अलग जनन छिद्रों (genital apertures) के द्वारा बाहर खुलती हैं |

9 – नर में मैथुन अंग अनुपस्थित होता है | निषेचन बाह्य (external) प्रकार का होता है |

उदाहरण – 1 – लेबिओ (Labeo) – रोहू (Rohu) , 2 – कटला (Catla) – कार्प (Carp) , 3 – एमिया (Amia) – धनुष मछली (Bow fish) , 4 – एंगुइला (Anguilla) – ईल (Eel) , 5 – हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) – समुद्री घोड़ा (Sea horse) , 6 – एक्सोसीटस (Exocoetus) – उड़न मछली (Flying fish) , 7 – इकेनीस (Echeneis) – चूषक मछली (Sucker fish) , 8 – लेटिमेरिया (Latimeria) – जीवित जीवाश्म (Living fossil) , 9 – सीलाकैन्थ (Coelacanth) – जीवित जीवाश्म (Living fossil) , 10 – गैम्बूसीया (Gambusia) – मच्छर मीन (Mosquito fish) – मच्छर के लार्वा को खाती है |

अधिवर्ग-2 (Super Classes-2) -टेट्रापोडा (Tetrapoda) (Gr., Tetra = four, podos = foot)

1 – इस महावर्ग के जन्तु जल एवं थल दोनों जगह पर पाये जाते हैं |

2 – 2 जोड़ी पंचांगुलीयुक्त (pentadactyl) पादों द्वारा चलन होता है |

3 – बाह्यकंकाल शल्कों (scales), परों (feathers) या बालों का होता है |

4 – अन्तःकंकाल मुख्यतः अस्थियों (bones) का बना होता है |

5 – श्वसन फेफड़ों (lungs) के द्वारा होता है |

6 – हृदय (heart) में 3 या 4 वेश्म होते हैं | इनमें दोहरा परिसंचरण (double circulation) होता है |

सुपरक्लास टेट्टापोडा को चार वर्गों में बांटा गया है –

वर्ग 1 – एम्फीबिया (Class – 1 Amphibia)(Gr., Amphi=both; bios = life)

1 – इस वर्ग के सदस्य जलीय एवं स्थलीय दोनों प्रकार के आवासों में पाये जाते हैं। इसलिए इन्हें जलस्थलघर (amphibians) कहते हैं |

2 – शरीर सिर (head) , धड़ (trunk) तथा पुच्छ (tail) में विभेदित होता है |

3 – त्वचा शल्क रहित लेकिन ग्रंथिल होती है | यह श्लेष्म के कारण नम होती है तथा श्वसन में सहायता करती है |

4 – दो जोड़ी पाद जल में तैरने या स्थल पर चलने में सहायता करते हैं | अग्र पाद में चार व पश्चपाद में पांच अंगुलियां होती हैं |

5 – खोपड़ी (skull) दो ऑक्सीपिटल कंडाइल्स द्वारा कशेरुक दंड (vertebral column) के प्रथम कशेरुक, एटलस (atlas) , से जुड़ी रहती है | इस प्रकार की करोटि को द्विकंडाडली (dicondylic) कहते हैं

6 – ये असमतापी (poikilothermal) या शीत रुधिर (cold blooded) वाले जन्तु हैं | इनके शरीर का तापमान, वातावरण के तापमान के अनुसार बदलता रहता है |

7 – श्वसन क्लोमों (gills) या त्वचा (skin) , फेफड़ों (lungs) तथा मुख-ग्रसनी गुहा (bucco-pharyngeal cavity) द्वारा होता है |

8 – हृदय तीन वेश्मी (three chambered) होता है , इसमें दो आलिन्द (auricle) तथा एक निलय (ventricle) होता है | ट्रंकस आरटीरियोसस (truncus arteriosus) पूर्ण विकसित होता है

उभयचर (जैसे मेंढक) के हृदय में ट्रंकस आर्टेरियोसस (truncus arteriosus) एक प्रमुख धमनी (arterial trunk) है | यह हृदय के वेंट्रिकल (ventricle) से शुद्ध और अशुद्ध रक्त को ग्रहण करके शरीर के विभिन्न अंगों, फेफड़ों और त्वचा तक पहुँचाने का कार्य करता है |

9 – लाल रुधिर कणिकाएं (red blood corpuscles) उभयोत्तल (biconvex) , अंडाकार (oval) तथा केन्द्रकयुक्त (nucleated) होती हैं |

10 – जनन वाहिनी (genital ducts) तथाआहार नाल एक ही छिद्र द्वारा बाहर खुलती है जिसे क्लोएका(cloaca) कहते हैं |

11 – उत्सर्जन एक जोड़ी वृक्क (kidneys) द्वारा होता है | वृक्क मीसोनेफ्रोस (mesonephros) प्रकार के होते हैं |

मीसोनेफ्रोस (Mesonephros) कशेरुकियों (Vertebrates) में भ्रूणीय विकास के दौरान बनने वाला या कुछ जीवों में पाया जाने वाला दूसरा आदिम प्रकार का गुर्दा (मध्य-वृक्क) है , इसे ‘वोल्फियन बॉडी’ (Wolfian Body) भी कहा जाता है |

12 – मस्तिष्क (brain) से 10 जोड़ी कपाल तंत्रिकाएं (cranial nerves) निकलती हैं |

13 – बाह्य कर्ण (external ear) अनुपस्थित होते हैं , मध्य कर्ण (middle ear) में कॉलूमेला (columella) नामक केवल एक कर्ण अस्थिका (ear ossicle) होती है |

14 – ये अंडयुज (oviparous) होते हैं | निषेचन बाह्य अथवा आन्तरिक होता है | अण्डे योकयुक्त व मध्यपीतक (mesolecithal) होते हैं |

15 – परिवर्धन अप्रत्यक्ष (indirect) प्रकार का होता है | लारवा अवस्था को टैडपोल (tadpole) कहते हैं | इसम कायान्तरण (metamorphosis) पाया जाता है |

उदाहरण – 1- राना (Rana) – मेंढक (Frog)

2 – ब्यूफो (Bufo) – साधारण टोड (Common toad)

3 – हायला (Hyla) – वृक्षाश्रयी मेंढक (Tree frog)

4 – सेलामेंड्रा (Salamandra) – यह जरायुज (viviparous) एम्फीबियन है |

5 – नेक्ट्यूरस (Necturus) – जलीय कुत्ता (Mud puppy)

6 – एम्बाइस्टोमा (Ambystoma) – चीता सेलामेंडर (Tiger salamander)

7 – एम्फीयूमा (Amphiuma) – कांगो ईल (Congo eel)

8 – इक्थियोफिस (Ichthyophis) – अन्धा कृमि (blindworm)

विशेष – एम्फिबिया वर्ग का विकास लोब फिन (lobe finned) मछलियों से हुआ है। इनमें वाताशय फेफड़ों में रूपान्तरित हो जाते हैं तथा इनके पैक्टोरल व पेल्विक फिन मांसल तथा लोव जैसे होते हैं | इनमें अस्थिल कंकाल होता है | इन मांसल व लोब्ड फिन से टेट्रापोडा के पंचांगुली पादों का विकास हुआ है |

वर्ग 2 – रेष्टीलिया(Class 2 – Reptilla) (L. Reptum=to creep)

ये वास्तविक स्थलीय जन्तु हैं इनकी त्वचा शुष्क श्रृंगी (cornified) तथा शल्क युक्त (scaly) होती है। ये प्रथम ऐम्निओटिक पृष्ठवंशी हैं जो अनिश्चित काल तक पानी से बाहर रह सकते हैं | मीसोजोइक युग में लगभग तीन सौ लाख वर्षों तक भूमि पर इनका पूर्ण आधिपत्य रहा | इनके विशिष्ट लक्षण निम्न प्रकार से हैं –

1 – ये प्रथम स्थलीय जन्तु हैं | इनकी त्वचा खुरदरी शुष्क व शृंगित (cornified) होती है |

2 – शरीर के बाहर चारों ओर श्रृंगित शल्कों अथवा अस्थिल स्कूट्स का बना बाह्यकंकाल होता है |

3 – ये असमतापी या शीत रुधिर वाले (cold blooded) स्थलचर क्रेनियेट्स हैं जिनमें दो जोड़ी पंचांगुलिपाद (pentadactyl limbs) होते हैं जिन पर तेज व नुकीले नखर (claws) होते हैं |

4 – शरीर सिर, धड़ एवं पुच्छ में भिन्नित होता है किन्तु पुच्छ में पुच्छ पख नहीं होता है।

5 – खोपड़ी एककन्दी (Monocondylic) होती है तथा इसमें एक या एक से अधिक टेम्पोरल फोसी (temporal fossae) होते हैं | पीनियल छिद्र (Pineal Foramen) भी पाया जाता है |

पीनियल छिद्र (Pineal Foramen) या पार्श्विका छिद्र (Parietal Foramen) कुछ मछलियों और सरीसृपों (जैसे छिपकली) की खोपड़ी के शीर्ष पर स्थित एक छोटा सा उद्घाटन है | यह छिद्र उनकी पीनियल ग्रंथि (Pineal Gland) या ‘तीसरी आंख’ को प्रकाश के प्रति संवेदनशील बनाता है , जिससे उन्हें दिन-रात के चक्र और तापमान को समझने में मदद मिलती है |

6 – श्वसन फेफड़ों (lungs) द्वारा होता है | क्लोम दरारें (gill clefts) केवल भ्रूण अवस्था में ही पायी जाती हैं |

7 – हृदय आंशिक रूप से चार वेश्मों में विभाजित होता है किन्तु क्रोकोडिलिया (Crocodilia) में निलय का विभाजन लगभग पूर्ण होता है | महाधमनी चापें (aortic arches) युग्मित होती हैं तथा वृक्क निवाहिका उपतंत्र (renal portal system) ह्रासित होता है |

8 – अंडे बड़े, पीतकयुक्त (yolky) तथा खोलयुक्त (shelled) होते हैं | भ्रूण में भ्रूण-बाह्य कलाएं (extraembryonic membranes) विकसित होती हैं | अतः अण्डों एवं भ्रूण में भूमि परिवर्धन के अनुरूप अनुकूलताएं पायी जाती हैं |

9 – भ्रूण के चारों ओर ऐम्निओन (amnion) , कोरिओन (chorion) तथा ऐलेन्टॉइस (allantois) भ्रूण बाह्य कलायें होने के कारण इन जन्तुओं को ऐम्निओटा (Amniota) कहते हैं |

उदाहरण – कीलोन (Chelone) – कछुआ , ट्रायोनिक्स (Tryonix) – नरम खोल वाले कछुआ

2 – हैमीडेक्टाइलस (Hemidactylus) – साधारण छिपकली , यूरोमैस्टिक्स (Uromastix)सांडा , वैरेनस (Varanus) – गोह

3 – नाजा (Naja) – कोबरा – इसका जहर न्यूरोटॉक्सिक या कार्डियोटॉक्सिक होता है |

4 – अजगर (Python) – सबसे बड़ा सर्प जिसमें पश्च पाद के अवशेष पाये जाते हैं | यह सर्प जहरीला नहीं होता है |

5 – क्रोकोडिलस (Crocodilus) – मगरमच्छ ; गेवियेलिस (Gavialis) – घड़ियाल , एलिगेटर (A gator) – मैक्सिको का क्रोकोडाइल |

वर्ग 2 – एवीज या पक्षी वर्ग (Class Aves)

इस वर्ग में वे कशेरुकी जन्तु रखे गये हैं जिनका शरीर पिच्छों से ढका रहता है तथा अग्रपाद पंखों में रूपान्तरित होते हैं –

1 – ये सभी प्रकार के वातावरण में पाये जाते हैं | इनका शरीर वायुवीय वातावरण के अनुकूल होता है |

2- शरीर नौकाकार तथा धारारेखित (stream-lined) होता है | यह सिर , गर्दन , धड़ व पुच्छ में विभाजित होता है | गर्दन लचीली तथा पूँछ छोटी होती है |

3 – इस वर्ग के जंतुओं में त्वचा पर कोमल परों (feathers) का आवरण होता है |

4 – पाद दो जोड़ी होते हैं | अग्रपाद (forelimbs) पंखों में रूपान्तरित होते हैं | पश्च पाद (hind limbs) पर चार-चार नखरयुक्त अंगुलियां होती हैं | ये पेड़ पर बैठने व स्थल पर चलने के अनुकूल होती हैं |

5 – शल्क केवल पश्च पादों पर पाये जाते हैं |

6 – जबड़ों में दांत नहीं होते हैं | हानी चोंच (horny beak) होती है जो भोजन पकड़ने में सहायक होती है |

7 – नेत्र बड़े तथा सुविकसित होते हैं | ये अस्थि प्लेटों से बने स्क्लेरोटिक छल्लों (sclerotic rings) से घिरे रहते हैं |

8 – त्वचा शुष्क होती है | पूंछ के नीचे तैल (oil) या प्रीन ग्रंथियां (preen glands) पायी जाती हैं |

9 – ये स्तनधारियों (mammals) की तरह समतापी (stenothermal or homoiothermal) होते हैं |

10 – अन्तःकंकाल (endoskeleton) पूर्णतया अस्थिल (bony) होता है | अस्थियाँ खोखली होने की वजह से इनमें वायु भरी होती है | इसके कारण ये हल्की लेकिन मजबूत होती हैं |

11 – करोटि में एक ऑक्सिपिटल कन्डाइल (occipital condyle) होता है | स्टर्नम बहुत बड़ा होता है जिससे उडड्‌यन पेशियां (flight muscles) जुड़ी रहती हैं |

ऑक्सिपिटल कन्डाइल (Occipital condyle) खोपड़ी (skull) के निचले हिस्से में स्थित दो अंडाकार या गुर्दे के आकार के अस्थि उभार (bony outgrowths) होते हैं। ये पश्चकपाल कंडाइल (Occipital condyle) फोरामेन मैग्नम (foramen magnum) के दोनों किनारों पर पाए जाते हैं और गर्दन की पहली हड्डी (एटलस या C1 कशेरुका) के साथ जुड़कर एटलेंटो-ऑक्सीपिटल जोड़ (atlanto-occipital joint) बनाते हैं |

12 – श्वसन (respiration) फेफड़ों (lungs) द्वारा होता है | इनसे सम्बन्धित वायुकोष (air sacs) भी पाये जाते हैं | ये उड़ते समय शरीर को हल्का रखते हैं |

13 – इनकी कशेरुकाओं (vertebrae) का सेन्ट्रम विषमगर्ती (heterococlous or saddle-shaped) होता है | पश्च वक्षीय , लम्बर , सेक्रल तथा अग्र पुच्छीय कशेरुकाएं मिलकर सिन्सेक्रम (synsacrum) बनाती हैं |

14 – कुछ आखिरी पुच्छ कशेरुकाएं (caudal vertebrae) समेकित (fuse) होकर पाइगोस्टाइल (pygostyle) बनाती हैं |

15 – पसलियां दो सिर (bifid) वाली होती हैं तथा प्रत्येक से एक अनसीनेट प्रवर्ध (uncinate process) भी निकला होता है |

16 – ध्वनि उत्पादन यन्त्र सिरिंक्स (syrinx) पाया जाता है |

17 – हृदय चार वेश्मीय (four chambered) होता है | सिर्फ दाहिना आयोर्टा (right aorta) उपस्थित होता है | लाल रुधिर कणिकाएं (RBC) केन्द्रकमय (nucleated) होती हैं |

18 – वृक्क (kidney) मेटानेफ्रीक (metanephric) प्रकार के होते हैं | मुत्राशय (urinary bladder) अनुपस्थित होता है |एवीज वर्ग के सदस्य यूरिक अम्ल उत्सर्जी (urecotelic) होते हैं |

19 – नेत्र (eye) बड़े होते हैं | इन पर निमेषक पटल (nictitating membrane) होता है | नेत्रों में अन्य बिंदु से जुड़ा एक पेक्टेन (pecten) होता है |

20 – ये एकलिंगी (unisexual) होते हैं | इनमें लैंगिक द्विरूपता (sexual dimorphism) पायी जाती है | मादा में सिर्फ बायां अंडाशय (left ovary) तथा बायीं अंडवाहिनी उपस्थित होती है। ये अंडज (oviparous) प्राणी हैं |

21 – निषेचन आन्तरिक (internal) होता है | अंडों पर CaCO3 का छिद्रित कवच (porous shell) पाया जाता है , ऐसे अंडों को क्लीडोइक अण्डे (cleidoic eggs) कहते हैं |

22 – भ्रूणीय परिवर्धन प्रत्यक्ष (direct) होता है | भ्रूणीय झिल्लियां उपस्थित होती हैं , इसीलिए इन जन्तुओं को amniota समूह में रखा जाता है |

उदाहरण – तोता (Indian parrot – Psittacula eupatria) , गौरैया (Common house sparrow – Passer domesticus) कोयल (Koel – Eudynamis scolopaceus) अफ्रीका का शुतुरमुर्ग या ऑस्ट्रिच (Ostrich – Struthio) , ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूगिनी के कैसोवरी (Cassowary – Casusuaris) , व ईमू (Emu) , अमेरिका का दक्षिणी रहिआ (Rhea) , न्यूजीलैंड की कीवी (Apteryx) |

वर्ग 4 -स्तनी वर्ग या मैमेलिया (Class 4 -Mammalia)

स्तनधारी (Mammals) कशेरुकी प्राणियों का एक उन्नत वर्ग है | इस वर्ग के प्राणियों की प्रमुख विशेषता यह है कि मादा अपने बच्चों को स्तन ग्रंथियों द्वारा दूध पिलाती है | इनके शरीर पर सामान्यतः बाल पाए जाते हैं तथा श्वसन फेफड़ों द्वारा होता है | इनका तंत्रिका तंत्र अत्यधिक विकसित होता है , जिसके कारण यह कशेरुकियों का सबसे अधिक विकसित वर्ग माना जाता है |

1 – शरीर पर रोयें तथा बाल होते हैं , ये या तो पूर्ण शरीर पर होते हैं अथवा फिर कुछ विशेष भागों में ही सीमित रहते हैं |

2 – त्वचा मोटी एवं जलअभेद्य (water proof) होती है तथा इसमें स्वेद ग्रंथियां एवं तैल ग्रंथियां होती हैं। ये केवल स्तनधारियों में पायी जाती हैं |

3 – शिशुओं का पोषण करने के लिए मादा में स्तन ग्रंथियां (mammary glands) होती हैं |

4 – मोनोट्रीम या अंडजस्तनी (Monotremes) को छोड़कर शेष सभी स्तनधारियों के कर्ण में बाह्य-मांसल कर्ण या पिन्ना होता है | (मोनोट्रीम या अंडजस्तनी (Monotremes) – यह अण्डे देते हैं और फिर जन्म लेने वाले शिशु को माता स्तन से दूध पिलाती हैं |)

5 – कपाल गुहा (cranial cavity) अधिक बड़ी होती है | नासा पथों (nasal passage) व मुखगुहा अथवा भोजनपथ को अलग करने के लिये एक अस्थिल पर्दा-सा होता है , इसको द्वितीयक तालू कहते हैं | यह प्रीमैक्सिली, मैक्सिली, तथा पैलेटाइन अस्थियों से बना होता है |

6 – खोपड़ी के टेम्पोरल भाग में जाइगोमैटिक आर्च होती है जो जबड़े की शक्तिशाली पेशियों के जुड़ने के लिये सतह प्रदान करती है |

7 – श्रवण कोष की अस्थियां (otic bones) परस्पर मिलकर पेरिओटिक अस्थि बनाती हैं , जिसमें आंतरिक कर्ण स्थित होता है |

8 – स्तनधारियों के श्रवण भाग में एक जोड़ी फ्लास्क के आकार की अस्थियां होती हैं | इनको टिम्पैनिक बुल्ला (tympanic bulla) कहते हैं | प्रत्येक टिम्पैनिक बुल्ला में तीन कर्ण अस्थिकाएं होती हैं जिनको मैलियस (malleus) , इनकस (incus) तथा स्टेपिस (stapes) कहते हैं | ये क्रमशः आर्टिकुलर, क्वाड्रेट तथा हायोमडिबुलर अस्थियों के रूपान्तर से बनती हैं |

9 – निचले जबड़े का प्रत्येक अर्धांश केवल एक ही अस्थि-दन्तिका (dentary) का बना होता है | जबड़ों का निलम्बन क्रेनियोस्टाइलिक (craniostylic) होता है |

10 – इनमें दांत गर्तदंती (thecodont) , विषमदंती (heterodont) तथा द्विबारदन्ती (diphyodont) प्रकार के होते हैं |

11 – कशेरुक अगर्ती (acoelous) तथा इनका सेंट्रम एम्फीप्लेटियान (amphiplatyan) प्रकार का होता है | सेंट्रम के दोनों सिरों पर एपिफाइसिस (epiphysis) नामक कार्टिलेज को बनी डिस्क (disc) होती है |

12 – ग्रीवा कशेरुकों (सर्विकल वर्टिब्री) की संख्या सभी स्तनधारियों में सात होती है |

13 – पाद पंचांगुलिपाद या पेंटाडेक्टाइल होते हैं किन्तु ये अनेक प्रकार से रूपांतरित व विशेषीकृत होते हैं |

14 – देहगुहा एक लचीले क्षैतिज पर्दे-डायफ्राम द्वारा वक्ष गुहा एवं उदर गुहा में विभाजित होती है |

15 – वक्ष गुहा में हृदय एवं फेफड़े होते हैं | हृदय के चारों ओर पेरिकार्डियल गुहा होती है तथा फेफड़ों के चारों ओर प्ल्यूरल गुहाएं होती हैं |

16 – हृदय चार वेश्मों में विभाजित होता है . शिरा पात्र अनुपस्थित होता है और केवल बायीं आयोटिंक चाप या दैहिक चाप (aortic arch) होती है | लाल रुधिर कणिकाओं में केन्द्रक नहीं होता है |

17 – शरीर का तापक्रम सदैव समान बना रहता है (नियततापी) |

18 – मस्तिष्क के सेरिब्रम व सेरिबेलम (cerebrum and cerebellum) भाग अधिक विकसित होते हैं | ऑप्टिक पालियां (optic lobes) चार होती हैं | इनको कॉर्पोरा क्याड्रिजेमिना (corpora quadrigemina) कहते हैं |

19 – आंतरिक कर्ण में कॉक्लिया नाम को लम्बी व सर्पिलाकार नलिका होती है जो ध्वनि तरंगों को ग्रहण करती है |

20 – नर स्तनधारियों में शिश्न (penis) के रूप में मैथुन अंग होता है तथा वृषण उदरगुहा के बाहर त्वचा के विशेष थैलेनुमा वृषण कोषों में होते हैं |

21 – मादा में स्तन ग्रंथियां होती हैं जिनमें शिशु के पोषण के लिये दूध बनता है |

22 – मादा के अंडाशय में ग्रेफियन फॉलिकल (Graafian follicles) होते हैं | प्रत्येक फॉलिकल से एक अंडा बनता है |

23 – स्तनियों में मूत्र-जनन मार्ग रेक्टम से अलग होता है | अतः दोनों अलग-अलग छिद्रों द्वारा शरीर के बाहर खुलते हैं |

24 – प्रोटोथीरिया (Prototheria) के अतिरिक्त सभी स्तनधारी जरायुजी (viviparous) होते हैं | भ्रूण गर्भनाल या प्लैसेंटा (placenta) द्वारा गर्भाशय की दीवार से जुड़ा होता है |

25 – इनमें पैतृक संरक्षण (parental care) पाया जाता है |

स्तनी वर्ग को तीन उपवर्गों में बाँटा गया है –

उपवर्ग 1 – प्रोटोथीरिया (Subclass 1 -Prototheria)

1 – ये आद्य (primitive) व रेप्टाइल के समान स्तनधारी हैं जो अंडे देते हैं | इनमें प्लैसेंटा नहीं पाया जाता है |

2 – स्तन-ग्रंथियां तो होती हैं किन्तु स्तनों में चूचुक (teats) नहीं होते हैं |

3 – ये आंशिक रूप से समतापी (partially homocothermic) होते हैं

4 – वाह्य कर्ण अनुपस्थित होता है तथा कॉक्लिया कम कुंडलित होता है |

5 – कशेरुकों पर एपिफाइसिस (epiphyses) अनुपस्थित होते हैं अथवा अविकसित होते हैं | पसलियों में केवल एक सिर होता है |

इन जीवों में कशेरुकाओं के केंद्र (सेंट्रम) पर एपिफाइसिस या तो पूरी तरह अनुपस्थित होते हैं या बहुत कम विकसित होते हैं एवं इनकी पसलियों में द्वि-शिरकीय (two heads) के बजाय केवल एक ही सिर पाया जाता है, जिससे वे कशेरुक दंड से जुड़ती हैं |

6 – मस्तिष्क में कॉर्पस कैलोसम (corpus callosum) भी अविकसित अथवा अनुपस्थित होता है |

कॉर्पस कैलोसम (Corpus Callosum) मस्तिष्क के बाएं और दाएं गोलार्धों (Hemispheres) को आपस में जोड़ने वाला तंत्रिका तंतुओं का एक बड़ा और मोटा समूह है , जो सूचनाओं के आदान-प्रदान में मदद करता है |

7 – नर में वृषण उदरगुहा में स्थित होते हैं |

8 – मादा में अंडवाहिनियों के पश्च भाग मिलकर गर्भाशय एवं योनि नहीं बनाते हैं |

9 – अंडे बड़े, पीतकयुक्त एवं खोलयुक्त होते हैं |

10 – ये रेप्टीलिया एवं स्तनधारियों के बीच की संयोजी कड़ी (connecting link) प्रदर्शित करते हैं |

11 – जनन मूत्र वाहिनियां तथा गुदा दोनों अवस्कर (cloaca) में खुलते हैं |

उदाहरण – कांटेदार कीटभक्षी टैकीग्लोसस (Tachyglossus – Spiny anteater)

आर्निथोरिंकस (Ornithorhynchus – Duck billed platypus) दोनों तस्मानिया व ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है |

उपवर्ग – 2 – थीरिया (Subclass – 2 – Theria)

1 – ये स्तनधारी जरायुजी (viviparous) होते हैं , जो शिशुओं को जन्म देते हैं |

2 – बाह्य कर्ण या कर्ण पल्लव (pinna) उपस्थित होता है |

3 – शिशु तथा वयस्क दोनों में दांत (teeth) पाये जाते हैं |

4 – ये समतापी (homoiothermal) होते हैं |

5 – गुदा (anus) व मुत्रोजनन छिद्र (uninogenital aperture) अलग-अलग होते हैं |

6 – नर में वृषण (testes) , शरीर के बाहर वृषण कोषों (scrotal sacs) में स्थित होते हैं |

7 – मादा में गर्भाशय (uterus) उपस्थित होते हैं भ्रूण (embryo) प्लेसेन्टा द्वारा गर्भाशय की भित्ति से जुड़ा रहता है |

थीरिया को दो अधोवर्गों में बाँटा गया है –

अधोवर्ग 1 – मेटाथीरिया (Infraclass 1 – Metatheria)

1- ये प्रारम्भिक प्रकार के स्तनधारी हैं | इनके शिशु अपरिपक्व अवस्था में पैदा होते हैं | इनका शेष परिवर्धन मादा के उदर पर स्थित मार्सुपियम (marsupium) में पूर्ण होता है |

2 – इनकी स्तन ग्रंथियों में चूचुक (nipples) पाये जाते हैं | ये भी मार्मूपियम के अन्दर स्थित होते हैं |

3 – कॉर्पस केलोसम (corpus callosum) कम विकसित या अनुपस्थित होता है |

4 – दांत जीवन में एक बार निकलते हैं अर्थात् एकबारदंती (monophyodont) होते हैं |

5 – इनकी श्रोणि मेखला (pelvic girdie) में एपीप्यूबिक या मासूपिअस्थि पायी जाती है |

मार्सूपियम (Marsupium) और एपिप्यूबिक (Epipubic) स्तनधारियों (विशेषकर मेटाथेरिया या मार्सूपियल्स जैसे – कंगारू) के शरीर की दो खास संरचनाएं हैं जो उनके प्रजनन और कंकाल तंत्र से जुड़ी हैं | एपिप्यूबिक (Epipubic) अस्थियों को मार्सूपियल अस्थियां भी कहते हैं क्योंकि ये मार्सूपियल्स में पेट की थैली (मार्सूपियम) को सहारा देती हैं और पेट की मांसपेशियों को मजबूती देती हैं

6 – गर्भाशय तथा योनि दोनों युग्मित रचनाएं (didelphic) होती हैं |

7 – इनमें योक सैक (yolk sac) प्लेसेन्टा पाया जाता है |

उदाहरण – मैक्रोपस (Macropus) कंगारू – जो केवल ऑस्ट्रेलिया में पाया जाता है।

अधोवर्ग 2 – यूथीरिया (Infraclass 2 – Eutheria)

1 – भ्रूण मादा के गर्भाशय में वास्तविक प्लेसेन्टा ऐलेन्टॉइक प्लैसेन्टा द्वारा पोषण प्राप्त करते हैं | शिशु का जन्म परिपक्व अवस्था में होता है |

2 – मासूपियम तथा एपीप्युबिक अस्थि अनुपस्थित होती हैं |

3 – स्तन ग्रंथियां सुविकसित तथा चूचुकयुक्त होती हैं |

4 – कॉर्पस केलोसम (corpus callosum) सुविकसित होती है |

5 – अवस्कर (cloaca) का अभाव, गुदा उपस्थित होती है |

6 – गर्भाशय एवं योनि केवल एक एक होते हैं |

इस अधोवर्ग की जीवित जातियों को करोटि (skull) , दांतों (teeth) आदि लक्षणों के आधार पर 16 गणों (orders) में बाँटा गया है | इनमें सबसे एडवांस गण प्राइमेट्स है –

गण – प्राइमेट्स (Order – Primates)

1 – इस गण के सदस्य उच्चतम विकसित स्तनधारी होते हैं जिनमें अधिकांश वृक्षवासी (arboreal) किन्तु कुछ भूमि पर रहने वाले हैं |

2 – प्रत्येक पाद पंचांगुली (pentadactyl) होता है | अंगुलियों पर चपटे नाखून (nail) होते हैं |

3 – अग्रपाद (forelimbs) वस्तुओं को पकड़ने के उपयुक्त होते हैं |

4 – स्तन ग्रंथियां (mammary glands) वक्ष भाग (thoracic region) में स्थित होती हैं |

5 – मस्तिष्क में घ्राण पिंड (olfactory lobes) छोटे होते हैं तथा सेरिब्रल गोलार्द्ध (cerebral hemisphere) सुविकसित होते हैं | इसलिए ये अधिक बुद्धिमान होते हैं |

6 – ये एक समय में एक ही शिशु को जन्म देते हैं |

उदाहरण – 1 – लीमर (Lemur) , 2 – चिम्पैन्जी (Chimpanzee – Anthropithecus) , बन्दर (Monkey – Macaca) ,

4 – मनुष्य (Man – Homo sapiens sapiens )

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